Tuesday, December 21, 2010

Hindi Poetry

ईस जंगलमे




ईस जंगलमे मेरा घर है
आपको स्वागत

कंक्रिटकी पेड़ और लोहे की पत्तियाँ
जब हिलती है
तो समझमे आता है
बजट पास होने वाला है

कुछ देर चिड़ियाँ गाना गाते हैँ।
पेड़ो पर उछलता हुवा
ये एक डालीसे दुसरी डाली
बसन्त! बसन्त!
गाते रहते हैँ
कोई रिकार्डेट धुन।
तो सम्झिए सरकार ईनपे मेहरबान है।

देखा होगा आपने भी शेर
बहुत बड़ चुकी है ईनकी संख्या
हर दफ्तरमे
भौँकते रहते है।
क्या बताँउ ईस जंगलमे
शेर दहाड़ना भूल चुके हैँ।

ईनसान ?
ओ हाँ रहते हैँ पिरामिड मे
देखिए तो सही
वो जो सबसे निचे है
समझ लिजिए कि मर चुके है
जो उससे थोड़ा उपर है
उन लोगोँका याददास्त खो चुका है
जो उससे भी उपर है
वो और उपर जाने की चाहत लिए
उछलता ही रहता है
उछलता ही रहता है
और वो जो सबसे उपर है
वो ही खुदको ईनसान कहता है
ये सब गिरने से डरते है
और समझते है यही हमारी दुनिया है !

सपना ?
जी हाँ जंगलमे सपना होते हैँ
ज्यादातर दिखते नही दिखाए जाते हैँ
उगाए नहीँ खरीदे जाते हैँ
जब भी सपना फ्री या डिस्काउन्टमे मिले
तो समझ लिजिए कि चुनाव आ गया

क्यो हँस रहे हैँ ?
जंगल अगर चुनाव ना हो तो जंगल ही क्या?
तभी तो असली जानवरोँ कि पहचान होती है।
भेँड़ बकरीयोँकी दलाली
और नमक हलालीका क्या खुब मेला जमता है
लेकिन मुझे ये नही मालुम
कि एक छोटा ब्यालोटकी ताबुतमे कितने लोगोँका शव एकसाथ दफ्न होती है

चौँकिए मत जनाब
जंगलमे मरना और मारना जायज हैँ
रोज शिकार चलता रहता है
जल्लादोँ की ईस जंगलमे
सिफ बँचना और बचाना गुनाह है ।

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